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Saturday, September 8, 2012

सुन्दर मौसम


ऐ मन तू खोया है किधर 
क्यों हर समय सुनता गैरों के सुर 
यों रह रह कर हरिया आभा आवाज़ देती 
यों झूम झूम कर लहलहाती किसानों की खेती 
उड़ चले नभ में 
पंख फैलाकर ये प्यारे खग विहग
चुपके से पानी में घात लगते बगुले जैसे हों ठग 
क्यों सोया अपनी धुन में 
क्यों सोया कंक्रीट के वन में 
बहुत देर हुई ऐ मन अब जग भी 
वर्षा होने पर बिल छोड़ते 
बहार निकलते उरग भी 
तृण पत्रों पर जमे ओस कण 
तेरी आँखों में क्यों है आंसू 
दुःख बाँट अपना धरती के संग 
प्रकृति नहीं जग सी प्रेम-पिपासु 
घुल जा मिल जा इस प्यारे समां में 
घुल जाएँगे दुःख सारे 
इन गोल मटोल ओस कणों से 
प्यारे होते कहीं अंगारे ?

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