याद तो ज़रूर आयेंगे वो खेल कीचड़ के,
वो मस्ती गली की टोली में,
ना होगी गुजियों की मिठास,
ना होगी तुम मेरे पास,
इस बरस की होली में|
जब खोया पाओगी खुद को,
गगन की उड़ती पतंगों में,
जब अनजाने में ही मुस्का दोगी,
देखकर कशिश फूलों के रंगों में,
जब अंगूर के बागों की मस्ती,
सपनों में आने लगेंगी,
जब तन्हाई की गूँज तुम पर
अपना जोर जताने लगेंगी|
तब ढूंढोगी फिर वही बचपन
अपने लल्ले की नन्ही हथेली में|
ना होगी गुजियों की मिठास,
ना होगी तुम मेरे पास,
इस बरस की होली में|
जब बेबात ही रूठ जाने पर
सजना तुम्हें मनाएंगे,
जब कुटुम्ब के वो सारे नियम,
अकसर तुम्हें सताएंगे|
जब चौथ के चाँद तले,
कोई पानी तुम्हे पिलाएगा,
जब हाँड़-मांस की काया पर,
अपना हक़ कोई जताएगा|
तब ढूंढोगी सब स्वच्छंद पलों को,
सिन्दूर,मेहंदी,महावर की लाली में|
ना होगी गुजियों की मिठास,
ना होगी तुम मेरे पास,
इस बरस की होली में|
-अर्चित अग्रवाल