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Tuesday, August 2, 2011

महंगाई बढ़ रही है मगर

महंगाई बढ़ रही है मगर......
ज़िन्दगी सस्ती हो चली है |

न कभी ग़ैरों की ज़िन्दगी से ली ख़ुशी,
न अपनों की मौत पर किया शिकवा |
नियम बदल डाले मुक्कदर के खेल के,
उसे बना बैठे दुश्मन जो कल तक था मितवा |

फ़रेबी, जालसाज़ी अब शौक बन चुके हैं,
मौत का कफ़न पहनाना भी मस्ती हो चली है |
महंगाई बढ़ रही है मगर......
ज़िन्दगी सस्ती हो चली है |

जहां सूरज के तप से फूल थे खिलते,
और जहां शब-ए-चिराग़ लगते थे तारे |
जहां धड़कते दिलों में थे अल्लाह के फ़रिश्ते,
और खुद ख़ुदा बस्ता था दरिया किनारे |

वह दरिया आज भी वहीं बहती है पर,
सूनी, राख की ढेरी वो बस्ती हो चली है |
महंगाई बढ़ रही है मगर......
ज़िन्दगी सस्ती हो चली है |

हम महफूज़ हैं, तभी चुप हैं,

लफ़्ज़ों को देते नहीं जुबां का साथ हैं |
जहां गम सराबोर है, वहीं ख़ुशी के आँसू,
ये कैसे हालात हैं, कैसे जज़्बात हैं ??

इस दुनिया की भीड़ में, मेरी ही तस्वीर में
लगता है मेरी हस्ती खो चली है |
महंगाई बढ़ रही है मगर......
ज़िन्दगी सस्ती हो चली है |
-प्रकाश सिंह

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