कागज की कश्ती में सवार होकर,
पूनम के चाँद में लहरों से जीतने चले,
हौसलों के हथियारों से,
बारूद की जंग जीतने चले|
ख्वाबों में आजादी का सहरा सजाकर,
रेत के महल में सोया करते,
खून टपकती छत के तले,
शीशे के अरमानों को पूरा करने चले|
पलकों के पर्दों की ढाल बनाकर,
तोपों के वार सहा करते,
पत्थर की बंदूकों के साथ,
जीत का जश्न मानाने चले|
मौत को अपना साथी बनाकर,
अपनी फौज बढ़ाते चले,
जख्मी पैरों से,
फिसलती दीवारें चढ़ते चले|
कड़कती धुप की तलवार लेकर,
दुश्मनों के सिर काटते चले,
सहमती हवाओं के रुख में,
अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते चले|
अपनी अपार फौज लेकर,
जीत के कदम धरते चले,
दुश्मनों का नामों-निशां न रहा,
हम आजादी की साँसे लेते चले|
- हेमन्त खत्री
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