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Tuesday, August 2, 2011

ख्वाहिशें


पथरीले रास्तों पे एडियाँ रगड़ने से,
मुझे दर नहीं लगता,
क्योंकि मैं उड़ना चाहता हूँ|
मुश्किलों के शोरगुल में लोग लड़खड़ाते,
सन्नाटे की आवाज़ से डर जाते,
मंज़िल की तरफ बढ़ने की रेंगती आवाज़ से,
लोगों के हौसले चिल्लाते,
मुझे घबराहट के स्वरों से डर नहीं लगता,
क्योंकि मैं गाना चाहता हूँ|
जरा देखो इन ऊँची इमारतों को,
जो हजारों सच दफनाये खड़ी हैं,
बीती कहानियों के लफ्जों से,
पुरानी परम्पराएँ बड़ी हैं,
मुझे कोरे पन्ने पलटने से डर नहीं लगता,
क्योंकि मैं सोचना चाहता हूँ|
जाने किस मोड़ पर ये ज़िंदगी थम जाये,
जाने कौनसा मंज़र इन क़दमों को रोक जाये,
मुझे मौत के काफ़िले से डर नहीं लगता,
क्योंकि मैं जीना चाहता हूँ|

-हेमन्त खत्री

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