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Saturday, September 8, 2012

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मैं मेरा दुःख और शराब

एक दिन की बात है,

मैं बहुत दुखी सा था,

ख़ुशी तो किसी बात की थी नहीं,

ख़ुशी आने की आस का भी सहारा न था|

दुःख मिटाने मैं चल पड़ा शराब के अड्डे,

साथ लिए कुछ नोट कड़के,

घूमता रहा शराब की तलाश में,

अंत में मिला मुझे एक अड्डा दुःख मिटाने की आस में|

जैसे ही मैं अन्दर घुसा,

गार्ड ने मुझे रोक लिया,

बोला- चलें है शराब पिने शरीर में तो नहीं जान,

घर जाओ दूध पीओ हो रही होगी तुम्हारी मम्मी परेशान|

मुझे इस बात पे आया बहुत गुस्सा,

लेकिन कुछ न कर सका वो था बहुत हट्टा-कट्टा,

शराब तो पीनी ही थी थान के आया था,

सीधी अंगुली से नहीं तो टेढ़ी अंगुली से काम चलाना था|

सोचा पाईप चढ़कर अन्दर घुसने का,

पहले लगा दर लेकिन करना था सिध्ध बच्चा न होने का,

जैसे ही पाईप चढ़ा देखा हवलदार ने देख लिया,

निचे उतारा मुझे और पुलिस स्टेशन साथ ले लिया|

वहा इंस्पेक्टर ने भी नहीं डाला हवालात में,

बोला बच्चा है मम्मी परेशान हो रही होगी रात में,

उसने मुझे डांट कर दिया भगा,

और उस दिन मैं रह गया दुखी, न पी पाया शराब|

-हेमंत खत्री

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