ये पन्ने आज भी कोरे नज़र आते हैं,
ये पन्ने ,
जो कभी खुद नहीं बोलते,
जो किसी पर निर्भर नहीं है,
लेकिन आज भी ये ख़ामोश हैं,
पता नहीं क्यों?
क्योंकि शायद लोगों की परछाइयाँ नहीं बोलती,
इस बेजान भीड़ में,
शायद मैं अकेला ही हूँ,
शायद मैं खुद से ही बोले जा रहा हूँ|
लेकिन इन पन्नों को न भरें तो क्या,
शायद ये खुद ही बोल पड़ें,
शायद ये पन्ने मुझे दिखाई दें|
-हेमन्त खत्री
nice! there is complete ambiguity in the environment.
ReplyDelete