Pages

Thursday, September 16, 2010

दीवारे शीशे नहीं


दीवारे शीशे नहीं ,
तो तोड़ के क्या गुनाह किया ?
ह्रदय की पारदर्शिता को नहीं,
चूने के दर्द को हटाया |
निडरता को नहीं,
इंटो के भय को तोडा |
मन की मिठास को नहीं,
बजरी की कडवास को हटाया |
तो तोड़ के क्या गुनाह किया ?
लोगो को गैरों से नहीं,
उनके अपनों से मिलाया |
बच्चों में उगते हुए फूलों को,
दादा-दादी ने खिलाया |
बड़ों के आशीर्वाद में,
घर की छत को मजबूत बनाया |
तो तोड़ के क्या गुनाह किया ?

-हेमन्त खत्री

No comments:

Post a Comment