रुकी बिखरी हुई सी राहें,
जैसे मंज़िल से भाग रहीं हैं|
सुबह को चलने लगे थे हम कभी,
लेकिन तेज सूरज ने पीछे धकेल दिया,
रात में चाँद की रोशनी भी फीकी नज़र आई,
और चलने से पहले वापस सुबह हो गई|
चलने को तो पूरा रेगिस्तान है,
लेकिन सिर्फ एक रास्ता ही नहीं है,
रेत के अपार ढेर में,
एक पत्थर भी नज़र नहीं आया|
एक बजा है अभी,
और कल भी एक ही बजा था,
जिस चलते वक्त के भरोसे थे हम,
आज वो भी वापस वहीँ आ गया|
हवाओं के साथ बहने की,
हमने भी कोशिश की,
लेकिन ये भी चक्रवात में बदल गईं|
- हेमन्त खत्री
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