ख्यालों में एक बात सी छुपी थी,
लेकिन ख्याल कभी आये ही नहीं,
कि बात से रूबरू हो पायें।
पलकों को पकड़कर जब,
ख्याल लाने कि कोशिश की,
तो ख्याल भी हमसे आँख मिचोली खेलकर,
बहते पानी में कहीं खो गए।
खुली आँखों से जब इन्हें ढूँढना चाहा,
तो धुंधले ख्याल अपनी बात,
ज़ाहिर ही नहीं कर पाए।
शायद मुझे ही इन्हें ढूँढना था,
मुझे ही इनको बात समझानी थी,
क्योंकि ख्याल तो मेरे ही मन के थे।
लेकिन ख्याल कभी आये ही नहीं,
कि बात से रूबरू हो पायें।
पलकों को पकड़कर जब,
ख्याल लाने कि कोशिश की,
तो ख्याल भी हमसे आँख मिचोली खेलकर,
बहते पानी में कहीं खो गए।
खुली आँखों से जब इन्हें ढूँढना चाहा,
तो धुंधले ख्याल अपनी बात,
ज़ाहिर ही नहीं कर पाए।
शायद मुझे ही इन्हें ढूँढना था,
मुझे ही इनको बात समझानी थी,
क्योंकि ख्याल तो मेरे ही मन के थे।
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