एक नीम था वहां
क्रीड़ास्थल के केंद्र पर
हरा भरा , संपन्न
पर उदास , अकेला
ईर्ष्या भरी निगाहों से
इंसानों को देखता रहता था
हँसते हुए , खेलते हुए, दौड़ते हुए ,
और उनके खिलखिलाते हुए उछलकूद करते बच्चे
मैंने कभी उसे हँसते नहीं देखा ......
पर एक बार एक विध्वंसकारी आंधी आई
अडिग टीलों के मुगालते मिटते हुए
क्षितिज को निगलते हुए
और झकझोरकर उखाड़ डाला
उस नीम को
आंधी के थपेड़ों के साथ लुढ़कता
छोटे पौधों को कुचलता वो
जब मेरे पास से निकला
तो उसने मेरी और देखा
और हम दोनों मुस्कुरा दिए ....
मैदान के कोने पर मैं बरगद बना अब भी खड़ा हूँ |
following are the questions:
1. इस कविता से कवि की मानसिकता के कौन से पहलू उजागर होते हैं ?
following are the questions:
1. इस कविता से कवि की मानसिकता के कौन से पहलू उजागर होते हैं ?
2. नीम की उदासी का क्या कारण है ?
3. आपके विचार में नीम और बरगद क्यों मुस्कुराए होंगे ?
4. कविता को एक उचित शीर्षक दीजिये |
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