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Saturday, September 10, 2011

Karodon khwaaishein...

करोड़ों ख्वाहिशों में से,


एक आशा पूरा करने चली वो


डर था उसे कि,

बेरंग दुनिया कि काली स्याही में,

कहीं दामन मैला ना हो जाये,

लेकिन सहारा भी था,

उस बेरंग बरसात का,

जो कड़ाके की ठंड में धूप दे जाये


लेकिन ये बरसात बेरंग ही निकली,

सुहावने मौसम में ओले बरसा गई,

उसके कोरे दामन को,

मैला कर गई
हेमंत खत्री

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