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Tuesday, April 5, 2011

इंतज़ार.....

बात उन स्वर्णिम दिनों की है,
जब कश्मीर धरती का स्वर्ग कहलाता था
हर भारतीय शान से
इसे भारत माता का शीश बतलाता था
जब नीले अंबर के तले आज़ाद परिंदा,
नए तराने गाता था...
उन विशाल पर्वतों की ओट में सूरज,
सुनहरी किरणें बरसाता था
हरी भरी वादियों क बीच ,
दुल्हन सी सजी वह धरती थी...
हर चौराहे, हर गलियारे में,
किलकारियां गूंजा करती थीं.....
जब मंद-मंद बहती हवा के झोंके
लहरों से बातें किया करते थे.........
ईद का चाँद हो या दीपावली का दिया,
यहाँ के आँगन में एक साथ चमका करते थे......


अब इसी घाटी में बदल चुकी है फिज़ा,
यहाँ पर जीना अपने आप में है सज़ा
अब नहीं सुनाई देती उन परिंदों की चहक
बारूद की गंध में खो गयी है, गुलमोहर की महक
यह गुलिस्तां अब उजड़ा सा एक चमन है....
खुली वादियों में भी अब घुट रहा जीवन है
जिन हाथों में किताबें थी, अब उन्ही हाथों में हथियार है
गरीबी और बेरोज़गारी से कश्मीरी युवा लाचार है...
कभी आज़ादी के लिए, तो कभी धर्म के नाम पर,
इंसान बना हैवान है.....
धरती के इस स्वर्ग की,
बस अब यही पहचान है....
हर ओर है छाया मातम, हर गलियारा अब सुनसान है,
भारत माता का यह शीश अब लहूलुहान है

एक छोटी सी चिंगारी,
यहाँ बन जाती है एक भीषण आग.....
जिसकी भेंट चढ़ जाते हैं,
सैंकड़ो आँगन के चिराग.....
विरोध की इस आग के बीच,
उम्मीद की एक लौ अब भी बरकरार है....
खौफ और दहशत में जी रहे कश्मीर को,
एक नए सवेरे का इंतज़ार है........

- Ravi Aswani

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